बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

गुरु महिलाओं का सौभाग्यवर्द्धक तथा संतानकारक ग्रह है।

गुरु महिलाओं का सौभाग्यवर्द्धक तथा संतानकारक ग्रह है। जन्म कुंडली में गुरु 1,2,4,5,11,12 में शुभ फल तथा 3,6,7,8,10 में अशुभ फल देता है। स्त्रियों की कुंडली में गुरु 7वें तथा 8वें भाव को अधिक प्रभावित करता है। मकर-कुंभ का अकेला गुरु पति-पत्नी के सुख में कमी लाता है। जलतत्वीय या कन्या राशि का सप्तम का गुरु होने पर पति-पत्नी के संबंध मधुर नहीं रहते।
सप्तम में शुभ गुरु व मीन-धनु का होने पर विवाह विच्छेद की स्थिति बनाता है। गुरु शनि से प्रभावित होने पर विवाह में विलंब कराता है। राहु के साथ होने पर प्रेम विवाह की संभावना बनती है। महिला कुंडली में आठवें भाव में बलवान गुरु विवाहोपरांत भाग्योदय के साथ सुखी वैवाहिक जीवन के योग बनाता है। आठवें भाव में वृश्चिक या कुंभ का गुरु ससुराल पक्ष से मतभेद पैदा कराता है।
1. गुरु यदि वृषभ-मिथुन राशि और कन्या लग्न में निर्बल-नीच-अस्त का हो तो वैवाहिक जीवन का नाश कराता है।
2. 1/5/9/11 का गुरु बली होने पर जल्दी विवाह के योग बनाता है, परंतु वक्री, नीच, अस्त, अशुभ, कमजोर होने पर विलंब।
3. मकर-कुंभ लग्न में सप्तम का गुरु भी प्रेम सम्बन्धों व वैवाहिक जीवन को समाप्त कराता है।
4. गुरु मिथुन-कन्या का गुरु लग्न या सप्तम में हो तो शुभ होता है।
5. अत्यंत प्रबल गुरु चंद्र-मंगल से उत्तम तालमेल होने पर पे्रम व वैवाहिक जीवन सफल होता है।
6. मेष लग्न में विवाह में विलंब सप्तम का गुरु कराता है।
7. कर्क-सिंह लग्न में 7/8 भाव का गुरु शुभ होने से प्रेम व वैवाहिक जीवन शुभ रहता है।
8. वृश्चिक-धनु-मीन लग्न का गुरु वैवाहिक जीवन सुखी बनाता है तथा सहायक होता है। मीन राशि का गुरु सप्तम में होने पर वैवाहिक जीवन कष्टप्रद रहता है।

शुक्रवार, 1 जनवरी 2010

2010 मार्च में शनिप्रदोष,अमावस्या

2010 मार्च में गणेश संकष्ट चतुर्थी,छत्रपति शिवाजी महाराज जयंती,रंगपंचमी,श्री एकनाथ षष्ठी,भानुसप्तमी- कालाष्टमी,विश्व महिला दिवस,सावित्रीबाई फुले स्मृतिदिवस वीरांगना अवंतिबाई का बलिदान दिवस,मधुकृष्ण त्रयोदशी- शनिप्रदोष,अमावस्या प्रारम्भ 14 मार्च 2010 रात्रि 12.31,15 मार्च 2010 सोमवती अमावस्या समाप्ति रात्रि 02.30,चैती नवरात्र प्रारंम्भ,गौरी तृतीया- मत्स्य जयंती पंचक समाप्ति 10.33,विनायक चतुर्थी,लक्ष्मी पंचमी,दुर्गाष्टमी,श्री रामनवमी,कामदा एकादशी,27 मार्च 2010 शनिप्रदोष,महावीर जयंती,29 मार्च 2010 हनुमान जयंती उपवास पूर्णिमा प्रारम्भ-11.40
चैत मास प्रारम्भ-2010
1 मार्च 2010
चैत मास प्रारम्भ
चैत कृ-1--सूर्य उदय 7.00 -- सूर्य अस्त 18.44
चन्द्रमा सिंह राशि में
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2 मार्च 2010
चैत कृ-2--सूर्य उदय 6.59 -- सूर्य अस्त 18.44
चन्द्रमा कन्या राशि में 21.30 तक
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3 मार्च 2010
चैत कृ-3
गणेश संकष्ट चतुर्थी
छत्रपति शिवाजी महाराज जयंती
सूर्य उदय 06.58-- सूर्य अस्त 18.44
चन्द्रमा कन्या राशि में21.30 तक
---------------------
4 मार्च 2010
चैत कृ-4-- सूर्य उदय 06.57 -- सूर्य अस्त 18.45
चन्द्रमा तुला राशि में
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5 मार्च 2010
चैत कृ-5-- रंगपंचमी
सूर्य उदय 06.57 -- सूर्य अस्त 18.45
चन्द्रमा तुला राशि में 26.04
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6 मार्च 2010
चैत कृ-6
श्री एकनाथ षष्ठी
सूर्य उदय 06.56 -- सूर्य अस्त 18.45
चन्द्रमा वृश्चिक राशि में
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7 मार्च 2010
चैत कृ-7
भानुसप्तमी- कालाष्टमी
सूर्य उदय 06.55 -- सूर्य अस्त 18.46
चन्द्रमा वृश्चिक राशि में
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8 मार्च 2010
चैत कृ-8
विश्व महिला दिवस
सूर्य उदय 06.54 -- सूर्य अस्त 18.46
चन्द्रमा वृश्चिक राशि में 10.53
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9 मार्च 2010
चैत कृ-9
सूर्य उदय 06.53 -- सूर्य अस्त 18.46
चन्द्रमा धनु राशि में
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10 मार्च 2010
चैत कृ-10
सावित्रीबाई फुले स्मृतिदिवस वीरांगना अवंतिबाई का बलिदान दिवस
सूर्य उदय 06.53 -- सूर्य अस्त 18.47
चन्द्रमा धनु राशि में 22.58 तक
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11 मार्च 2010
चैत कृ-11
पापमोचनी एकादशी
सूर्य उदय 06.52 -- सूर्य अस्त 18.47
चन्द्रमा मकर राशि में
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12 मार्च 2010
चैत कृ-12
सूर्य उदय 06.51 -- सूर्य अस्त 18.47
चन्द्रमा मकर राशि में
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13 मार्च 2010
चैत कृ-13
मधुकृष्ण त्रयोदशी- शनिप्रदोष
पंचक प्रारंभ-12.04
सूर्य उदय 06.50 -- सूर्य अस्त 18.47
चन्द्रमा मकर राशि में 12.04
---------------------
14 मार्च 2010
चैत कृ-14
अमावस्या प्रारम्भ रात्रि 12.31
सूर्य उदय 06.46 -- सूर्य अस्त 18.48
चन्द्रमा कुंभ राशि में
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15 मार्च 2010
चैत सोमवती अमावस्या समाप्ति रात्रि 02.30
सूर्य उदय 06.49 -- सूर्य अस्त 18.48
चन्द्रमा कुंभ राशि में 24.12
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16 मार्च 2010
चैत शु.-1 -- चैती नवरात्र प्रारंम्भ
सूर्य उदय 06.48 -- सूर्य अस्त 18.48
चन्द्रमा मीन राशि में
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17 मार्च 2010
चैत शु.-2
सूर्य उदय 06.47 -- सूर्य अस्त 18.48
चन्द्रमा मीन राशि में
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18 मार्च 2010
चैत शु.-3
गौरी तृतीया- मत्स्य जयंती पंचक समाप्ति 10.33
गणगौर पूजा
सूर्य उदय 06.46 -- सूर्य अस्त 18.49
चन्द्रमा मीन राशि में 10.33
--------------------
19 मार्च 2010
चैत शु.-4
विनायक चतुर्थी
सूर्य उदय 06.45 -- सूर्य अस्त 18.49
चन्द्रमा मेष राशि में
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20 मार्च 2010
चैत शु.-5
लक्ष्मी पंचमी
सूर्य उदय 06.44 -- सूर्य अस्त 18.49
चन्द्रमा मेष राशि में
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21 मार्च 2010
चैत शु.-6
सूर्य उदय 06.44 -- सूर्य अस्त 18.49
चन्द्रमा वृषभ राशि में
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22 मार्च 2010
चैत शु.-7
सूर्य उदय 06.43 -- सूर्य अस्त 18.50
चन्द्रमा वृषभ राशि में 25.11 तक
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23 मार्च 2010
चैत शु.-8
दुर्गाष्टमी
सूर्य उदय 06.42 -- सूर्य अस्त 18.50
चन्द्रमा मिथुन राशि में
---------------------
24 मार्च 2010
चैत शु.-9 चैत नवरात्र समाप्ति
श्री रामनवमी
सूर्य उदय 06.41 -- सूर्य अस्त 18.50
चन्द्रमा मिथुन राशि में 29.03 तक
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25 मार्च 2010
चैत शु.-10
सूर्य उदय 06.40 -- सूर्य अस्त 18.50
चन्द्रमा कर्क राशि में
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26 मार्च 2010
चैत शु.-11
कामदा एकादशी
सूर्य उदय 06.39 -- सूर्य अस्त 18.51
चन्द्रमा कर्क राशि में
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27 मार्च 2010
चैत शु.-12
शनिप्रदोष
सूर्य उदय 06.39 -- सूर्य अस्त 18.51
चन्द्रमा कर्क राशि में 06.43 तक
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28 मार्च 2010
चैत शु.-13 महावीर जयंती
सूर्य उदय 06.38 -- सूर्य अस्त 18.51
चन्द्रमा सिंह राशि में
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29 मार्च 2010
चैत शु.-14 हनुमान जयंती उपवास पूर्णिमा प्रारम्भ-11.40
सूर्य उदय 06.38 -- सूर्य अस्त 18.51
चन्द्रमा सिंह राशि में 07.10तक
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30 मार्च 2010
अधिक वैशाख कृ-1 चैत पूर्णिमा
हनुमान जयंती
पूर्णिमा-07.55 पर समाप्त
सूर्य उदय 06.38 -- सूर्य अस्त 18.51
चन्द्रमा कन्या राशि में
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31 मार्च 2010
अधिक वैशाख कृ-2
सूर्य उदय 06.35 -- सूर्य अस्त 18.52
चन्द्रमा कन्या राशि में 08.09

फरवरी-2010 के वर्त-पर्व होली-पूर्णिमा समाप्ति रात्रि 10.08

फरवरी-2010 के वर्त-पर्व
होली-पूर्णिमा समाप्ति रात्रि 10.08
1 फरवरी-2010
फाल्गुन कृ-3
संत नरहरि सोनार पुण्यतिथि
सूर्य उदय 7.14
सूर्य अस्त 18.31
चन्द्रमा सिंह राशि में
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2 फरवरी-2010
फाल्गुन कृ- 4
अंगारक गणेश संकष्ट चतुर्थी
सूर्य उदय- 7.14
सूर्य अस्त 18.32
चन्द्रमा सिंह राशि में 09.21 तक
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3 फरवरी-2010
फाल्गुन कृ- 5
सूर्य उदय- 7.14
सूर्य अस्त 18.33
चन्द्रमा कन्या राशि में
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4 फरवरी-2010
फाल्गुन कृ- 6
सूर्य उदय- 7.13
सूर्य अस्त 18.33
चन्द्रमा कन्या राशि में 11.52 तक
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5 फरवरी-2010
फाल्गुन कृ- 7
कालाष्टमी
सूर्य उदय- 7.13
सूर्य अस्त 18.34
चन्द्रमा तुला राशि में
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6 फरवरी-2010
फाल्गुन कृ- 8
जानकी जन्म
सूर्य उदय- 7.13
सूर्य अस्त 18.34
चन्द्रमा तुला राशि में 18.12 तक
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7 फरवरी-2010
फाल्गुन कृ- 9
श्री रामदास नवमी
सूर्य उदय- 7.12
सूर्य अस्त 18.35
चन्द्रमा वृश्चिक राशि में
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8 फरवरी-2010
फाल्गुन कृ- 10
स्वामी दयानंद सरस्वती जयंती
सूर्य उदय- 7.12
सूर्य अस्त 18.35
चन्द्रमा वृश्चिक राशि में 28.16 तक
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9 फरवरी-2010
फाल्गुन कृ- 11
विजया एकादशी
सूर्य उदय- 7.11
सूर्य अस्त 18.36
चन्द्रमा धनु राशि में
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10 फरवरी-2010
फाल्गुन कृ- 12
सूर्य उदय- 7.11
सूर्य अस्त 18.36
चन्द्रमा धनु राशि में
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11 फरवरी-2010
फाल्गुन कृ- 13
प्रदोष
सूर्य उदय- 7.10
सूर्य अस्त 18.37
चन्द्रमा धनु राशि में16.40 तक
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12 फरवरी-2010
फाल्गुन कृ- 14
महाशिवरात्रि निशीथकाल रात 12.29 से 01.19 तक
अमावस्या आरंभ
उ. रात्रि 05.40
सूर्य उदय- 7.10
सूर्य अस्त 18.37
चन्द्रमा मकर राशि में
---------------------
13 फरवरी-2010
फाल्गुन अमावास्या
लोहडी
पंचक प्रारंभ रात्रि 4.45 बजे से
सूर्य उदय- 7.9
सूर्य अस्त 18.38
चन्द्रमा मकर राशि में 29.43
-----------------
14 फरवरी-2010
फाल्गुन अमावास्या समाप्ति सुबह 8.20
मकर संक्राति
सूर्य उदय- 7.09
सूर्य अस्त 18.38
चन्द्रमा कुभ राशि में
-----------------
15 फरवरी-2010
फाल्गुन शु.- 1
मोनी अमावास्या (सूर्य ग्रहण)
सूर्य उदय- 7.08
सूर्य अस्त 18.38
चन्द्रमा कुभं राशि में
----------------
16 फरवरी-2010
फाल्गुन शु.- 2
रामकृष्ण परमहंस जयंती
सूर्य उदय- 7.08
सूर्य अस्त 18.39
चन्द्रमा कुभं राशि में 18.05 तक
-----------------------
17 फरवरी-2010
फाल्गुन शु.- 3
सूर्य उदय- 7.07
सूर्य अस्त 18.39
चन्द्रमा मीन राशि में
----------------------
18 फरवरी-2010
फाल्गुन शु.- 4
विनायक चतुर्थी
सूर्य उदय- 7.07
सूर्य अस्त 18.40
चन्द्रमा मीन राशि में 28.54 तक
---------------------
19 फरवरी-2010
फाल्गुन शु.- 5
छत्रपति शिवाजी महाराज जयंती
सूर्य उदय- 7.06
सूर्य अस्त 18.40
चन्द्रमा मेष राशि में
---------------------
20 फरवरी-2010
फाल्गुन शु.- 6
सूर्य उदय- 7.06
सूर्य अस्त 18.41
चन्द्रमा मेष राशि में
---------------------
21 फरवरी-2010
फाल्गुन शु.- 7
भानुसप्तमी
होलाष्टक प्रारम्भ
सूर्य उदय- 7.05
सूर्य अस्त 18.41
चन्द्रमा मेष राशि में 13.20 तक
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22 फरवरी-2010
फाल्गुन शु.- 8
दुर्गाष्टमी
सूर्य उदय- 7.04
सूर्य अस्त 18.41
चन्द्रमा वृषभ राशि में
---------------------
23 फरवरी-2010
फाल्गुन शु.- 9
सूर्य उदय- 7.04
सूर्य अस्त 18.42
चन्द्रमा वृषभ राशि में 18.42 तक
----------------------
24 फरवरी-2010
फाल्गुन शु.- 10
सूर्य उदय- 7.03
सूर्य अस्त 18.42
चन्द्रमा मिथुन राशि में
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25 फरवरी-2010
फाल्गुन शु.- 11
आमलकी एकादशी
सूर्य उदय- 7.02
सूर्य अस्त 18.42
चन्द्रमा मिथुन राशि में 20.55 तक
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26 फरवरी-2010
फाल्गुन शु.- 12/13
प्रदोष - गोविंद द्वदशी
सूर्य उदय- 7.02
सूर्य अस्त 18.43
चन्द्रमा कर्क राशि में
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27 फरवरी-2010
फाल्गुन शु.- 14
ईद-ए-मिलाद
पूर्णिमा प्रारंभ उ. रात्रि01.51
सूर्य उदय- 7.01
सूर्य अस्त 18.43
चन्द्रमा कर्क राशि में 20.55 तक
----------------------
28 फरवरी-2010
फाल्गुन शु.-
होली-पूर्णिमा समाप्ति रात्रि 10.08
सूर्य उदय- 7.00
सूर्य अस्त 18.43
चन्द्रमा सिंह राशि में

बुधवार, 30 दिसंबर 2009

प्रेम में सफलता और सुंदर पति अथवा पत्नी की प्राप्ति होती है।

मनुष्य के जीवन के बनने बिगड़ने में रेखाओं हथेली में विद्यमान पर्वतों, पोरों, चिह्नों आदि की भूमिका अहम होती है। इन सबका ज्ञान हमें हस्त सामुद्रिक शास्त्र से मिलता है। विद्वानों का मानना है कि हस्त रेखाएं स्थिर हैं, कभी बदलती नहीं। परंतु वैज्ञानिक खोजों से स्पष्ट हो चुका है कि रेखाएं परिवर्तनशील होती हैं।
विवाह एवं वैवाहिक जीवन की स्थिति पता लगाने के लिए कुछ विद्वान छोटी उंगली के नीचे स्थित बुध पर्वत की रेखाओं का विश्लेषण करते हैं तो कुछ अन्य शुक्र पर्वत से। किंतु कुछ विद्वानों का मानना है कि ये वास्तव में विवाह रेखाएं नहीं हैं। बल्कि ये जीवन को विभक्त करने वाली रेखाएं हैं। विवाह भी जीवन को दो भागों में बांट देता है- एक विवाह पूर्व का और दूसरा विवाह के बाद का।
1--अगर किसी रेखा में से कोई रेखा निकल कर नीचे की ओर जाए या नीचे की ओर झुके तो उसका फल प्रतिकूल होता है या कमी आती है। इसके विपरीत ऐसी कोई रेखा ऊपर की ओर जाए तो फल में वृद्धि होती है।
2--जंजीरनुमा रेखा अशुभ फल देती है।
3--यदि विवाह रेखा, जो बुध पर्वत पर होती है, जंजीरनुमा हो तो प्रेम प्यार में असफलता का मुंह देखना पड़ता है।
4--यदि मस्तिष्क रेखा जंजीरनुमा हो तो व्यक्ति अस्थिर बुद्धि वाला अथवा पागल हो सकता है।
5--लहरदार रेखा अशुभ मानी गई है। ऐसी रेखाएं शुभ फल प्रदान नहीं करती हैं।
6--रेखा अगर कहीं पतली और कहीं मोटी हो तो रेखा अशुभ होती है। ऐसी रेखा वाला व्यक्ति बार-बार धोखा खाता है तथा सफलता-असफलता के बीच झूलता रहता है।
7--जीवन रेखा के अतिरिक्त यदि कोई अन्य रेखा अपने आखिरी सिरे पर पहुंच कर दो भागों में बंटी हो तो वह अत्यंत प्रभावी तथा श्रेष्ठ फल देने वाली होती है। परंतु यदि हृदय रेखा दो भागों में बंटी हो तो व्यक्ति को हृदय रोग की संभावना रहती है।
8--यदि प्रणय रेखा से कोई रेखा निकल कर ऊपर की ओर जाए तो प्रेम में सफलता और सुंदर पति अथवा पत्नी की प्राप्ति होती है। परंतु यदि नीचे की ओर रुख करे तो प्रेम में असफलता मिलती तथा पति अथवा पत्नी को अस्वस्थता का सामना करना पड़ता है।

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

शनि की अशुभ स्थिति से मुक्ति और बचाव के कुछ टोटके प्रस्तुत हैं

शनि की अशुभ स्थिति से मुक्ति और बचाव के लाल किताब पर आधारित कुछ टोटके प्रस्तुत हैं। इन टोटकों का प्रयोग निष्ठापूर्वक किया जाए तो अनुकूल फल की प्राप्ति हो सकती है।
शनि जब शुभ होगा तब मकान के स्वामी व निवासी को सुख मिलेगा। शनि के अशुभ होने पर मकान से संबंधित परेशानी होती है और गृहस्वामी, गृहस्वामिनी और संतान को कष्ट झेलना पड़ता है। किरायेदार द्वारा मकान पर कब्जा, फैक्ट्री या दुकान कर्मचारियों द्वारा धोखाधड़ी, चोरी, या हानि पहुंचाना, न्यायालय द्वारा कुर्की, प्रशासन व महापालिका द्वारा अनेक प्रकार की आपत्तियां आदि समस्याएं उत्पन्न होती हैं।
---शनि लग्नस्थ हो और मकान बनवाया जाए तो यह धन और परिवार के लिए अशुभ होगा। निर्धनता, कुर्की, पैतृक संपत्ति के नाश होने आदि की संभावना रहती है। व्यक्ति धोखेबाज, अशिक्षित, बेईमान, झगड़ालू, नेत्रहीन और अल्पायु हो सकता है। उसे संतान सुख की संभावना भी कम रहती है ।
उपाय:
1-मद्यपान व मांस का सेवन न करें।
2-वीरान जगह पर भूमि के नीचे सुरमा दबाएं।
3-बरगद के वृक्ष की जड़ में दूध चढ़ाकर गीली मिट्टी का तिलक लगाएं, विद्या में बाधा व रोग से मुक्ति मिलेगी।
4-धन वृद्धि के लिए बंदर पालें अथवा शनिवार को बंदर को खाना दें।
5-लोहे के तवे, चिमटे व अंगीठी का दान करें।
---शनि अगर दूसरे भाव में अशुभ हो तो मकान अपने आप बनेगा। परंतु आपत्ति हानिकारक होगी। यदि शनि दूसरे में और राहु 12वें में हो तो ससुराल में धन की कमी होती है। यदि गुरु 11वें में हो तो अपयश मिलेगा। यदि दूसरे भाव में शनि के साथ मंगल अशुभ हो तो जातक 28 से 39वें वर्ष तक रोगी रहेगा।
उपाय:
1-प्रत्येक शनिवार नंगे पांव मंदिर जाकर क्षमा याचना करें।
2-शिवलिंग पर जल चढ़ाएं।
3-काली या दोरंगी भैंस, कुत्ता व अन्य कोई जानवर न पालें।
4-अपने माथे पर कभी तेल न लगाएं।
5-गाय के दूध या दही का तिलक लगाएं।
---शनि जन्मकुंडली के तृतीय भाव में अशुभ स्थिति में हो तो धन का अभाव या हानि कराता है। जातक को नेत्र रोग होगा या दृष्टि कमजोर होगी रोमकूपों में रोएं अधिक हों तो जातक निर्धन, अयोग्य व अय्याश होगा। शनि तीसरे व चंद्र 10वें में हो तो अवैध ढंग से धनार्जन करने के बावजूद जातक धनहीन रहेगा और उसके घर का कुआ अथवा घर ही मौत का कारक बनेगा। तीसरे भाव स्थित शनि के शत्रु ग्रह साथ हों तो जातक समस्याओं व धनहानि से परेशान रहेगा। यदि सूर्य भाव 1, 3 या 5 में हो तो लड़का व शनि का अशुभफल मिलेगा।
उपाय:
1-फकीरों और पालतू व कुत्तों की सेवा करें, या तीन कुत्तों की सेवा करें तो मकान बनेगा।
2-घर में कुत्ता सदैव पालें अन्यथा शनि व केतु का अशुभ फल मिलेगा।
3-केतु का उपाय करने पर धन संपत्ति बढ़ेगी।
4-घर की दहलीज को लोहे की कीलों से कीलें।
5-नेत्रों की औषधि मुफ्त बांटने से दृष्टिदोष दूर होगा।
6-भवन के अंत में अंधेरी कोठरी बनाना धन संपत्ति के लिए शुभ होगा।
7-मांस या शराब का सेवन यदि आप नहीं करेगे तो दीर्घ आयु होगी।
---शनि जन्मकुंडली के चतुर्थ भाव में अशुभ हो तो माता, मामा, दादी, सास और नानी पर अशुभ प्रभाव पड़ेगा। अर्थात मकान की नींव खोदते ही ससुराल और ननिहाल पर अशुभ प्रभाव पड़ना शुरू हो जाएगा या जातक को अपने बनाए मकान का सुख प्राप्त नहीं होगा। ऐसे जातकों को प्लाॅट लेकर मकान नहीं बनवाना चाहिए। परस्त्री से संबंध बनाने पर शनि का अशुभ फल मिलता है। शनि चैथे व गुरु तीसरे में हो तो धोखे व लूटपाट से संपत्ति बढ़ेगी। मकानों के कारोबार से लाभ मिलेगा।
उपाय:
1-सांप को दूध पिलाएं।
2-कौओं को छत पर रोटी डालें।
3-भैंस पालें या उसे प्रिति दिन रोटी खिलायें।
4-मजदूर से अतिक्ति सेवा लेने का प्रयास न करे।
5-कुएं में कच्चा दूध डालें।
6-परस्त्री अथवा विधवा से संबंध रखें अन्यथा निर्धन और कंगाल हो जाएंगे।
7-बहते पानी में शराब बहाएं।
8-रोग से मुक्ति हेतु शनि की वस्तुओं का प्रयोग करें।
9-सांप को न मारें।
10-शराब न पीएं।
11-रात्रि में दूध न पीएं।
---शनि जन्मकुंडली के पंचम भाव में हो तो मकान बनवाने पर संतान को कष्ट होगा। संतान का बनाया मकान जातक को शुभ फल देगा। संतान को यदि मकान बनवाना पड़े तो जातक की 48 वर्ष की आयु के बाद ही बनवाएं। संतान के बनाए मकान में वहम न करें। शनि पांचवें भाव में हो और वर्ष कुंडली में जब भी सूर्य, चंद्र और मंगल 5 वें में आएंगे तब जातक का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहेगा। जातक के तन पर बाल अधिक हों तो वह चोर, धोखेबाज और दुर्भाग्यशाली होगा। कलम पर काबू होने पर भी निर्धन रहेगा। रोग, मुकदमे व झगड़ों से परेशान रहेगा। धन की हानि और संतान को कष्ट होगा साथ ही स्वास्थ्य खराब रहेगा और गुलामी करनी पड़ेगी।
उपाय:
1-पैतृक भवन की अंधेरी कोठरी में सूर्य की वस्तुएं गुड़, तांबा, भूरी भैंस, बंदर, मंगल की वस्तुएं सौंफ, खांड, शहद, लाल मूंगे, हथियार और चंद्र की वस्तुएं चावल, चांदी, दूध, कुएं, घोड़े आदि की व्यवस्था करें।
2-अपने भार के दशांश के तुल्य बादाम बहते पानी में बहाएं या धर्मस्थल में ले जाकर आधे बादाम घर में रखें, उन्हें खाएं नहीं।
3-संतान के जन्म लेने पर मीठा न बांटें, यदि बांटंे तो उसमें नमक लगा दें।
4-कुत्ता पालें।
---शनि जन्म कुंडली के षष्ठ भाव में अशुभ स्थिति में हो तो जातक अपनी आयु के 36 बल्कि 39 वर्ष बाद मकान बनाए तो शुभ होगा। 48 वर्ष की आयु के बाद बनाना लड़की के ससुराल के लिए अशुभ होगा। ऐसे जातकों को नुक्कड़ का मकान न तो बनवाना चाहिए और न ही खरीदना चाहिए। शनि की वस्तुएं (चमड़े व लोहे की वस्तुएं) घर पर लाना या सजाना अशुभ होगा। जिस वर्ष वर्ष कुंडली में भी छठे भाव में आए, उस वर्ष राज्यभय, दुख व अशुभ फल मिलेंगे। शराब व मांस का सेवन हानिकारक होगा। 28 से पूर्व विवाह करने पर 34 से 36 वर्ष के बीच माता व संतान शोक होगा तथा कष्ट बढ़ेंगे।
उपाय:
1-तेल में अपना मुंह देखकर सरसों के तेल का भरा बर्तन पानी के भीतर जमीन के नीचे दबाएं।
2-शनि संबंधी कार्य कृष्ण पक्ष में रात्रि में करें।
3-सांप की सेवा (दूध पिलाने) से संतान सुख मिलेगा।
4-नारियल या बादाम बहते पानी में प्रवाहित कराएं।
5-बुध का उपाय करें।
6-काला कुत्ता पालें या उसकी सेवा करें या उसे रोटी दें।
अन्य भावो के विषय में जल्द देगे आप अपने विचारो से अवगत अवश्य करायें।

गुरुवार, 26 नवंबर 2009

पर्व त्यौहार जनवरी-2010

1 जनवरी-2010
माघ कृ.1
सूर्य उदय 7.13
सूर्य अस्त 18.12
चन्द्रमा मिथुन राशि में 22.38 तक
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2 जनवरी-2010
माघ कृ.2
सूर्य उदय 7.14
सूर्य अस्त 18.13
चन्द्रमा कर्क राशि में
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3 जनवरी-2010
माघ कृ.3
गणेश चतुर्थी
सूर्य उदय 7.14
सूर्य अस्त 18.13
चन्द्रमा कर्क राशि में 22.38तक
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4 जनवरी-2010
माघ कृ.4
सूर्य उदय 7.14
सूर्य अस्त 18.14
चन्द्रमा सिंह राशि में
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5 जनवरी-2010
माघ कृ.5/6
गुरू गोविंद सिंह जयंती
सूर्य उदय 7.15
सूर्य अस्त 18.15
चन्द्रमा सिंह राशि में 24.14
---------------------
6 जनवरी-2010
माघ कृ.7
स्वामी विवेकानंद जयंती
सूर्य उदय 7.15
सूर्य अस्त 18.15
चन्द्रमा कन्या राशि में
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7 जनवरी-2010
माघ कृ.8
सूर्य उदय 7.15
सूर्य अस्त 18.16
चन्द्रमा कन्या राशि में 28.38तक
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8 जनवरी-2010
माघ कृ.9
सूर्य उदय 7.15
सूर्य अस्त 18.17
चन्द्रमा तुला राशि में
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9 जनवरी-2010
माघ कृ.10
सूर्य उदय 7.15
सूर्य अस्त 18.17
चन्द्रमा तुला राशि में
---------------------
10 जनवरी-2010
माघ कृ.11
षटतिला एकादशी
सूर्य उदय 7.15
सूर्य अस्त 18.17
चन्द्रमा तुला राशि में 12.11तक
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11 जनवरी-2010
माघ कृ.12
सूर्य उदय 7.16
सूर्य अस्त 18.19
चन्द्रमा वृश्चिक राशि में
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12 जनवरी-2010
माघ कृ.13
भौमप्रदोष
स्वामी विवेकानंद जयंती
राष्ट्रीय युवा दिवस
सूर्य उदय 07.15
सूर्य अस्त 18.17
चन्द्रमा वृश्चिक राशि में 22.28तक
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13 जनवरी-2010
माघ कृ.13
शिवरात्रि, कालिका पूजा
सूर्य उदय 07.16
सूर्य अस्त 18.20
चन्द्रमा धनु राशि में
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14 जनवरी-2010
माघ कृ.14
मौनी अमावास्या मकर संक्रान्ति पुण्यकाल 12.37 से 18.19 तक
अमावास्या प्रारंभ सुबह 10.11
सूर्य उदय 07.16
सूर्य अस्त 18.20
चन्द्रमा धनु राशि में
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15 जनवरी-2010
माघ अमावास्या
सूर्यग्रहण
अमावास्या समाप्ति
सूर्य उदय 07.16
सूर्य अस्त 18.21
चन्द्रमा धनु राशि में 10.36 तक
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16 जनवरी-2010
माघ शु.1
सूर्य उदय 07.16
सूर्य अस्त 18.22
चन्द्रमा मकर राशि में
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17 जनवरी-2010
माघ शु.2
पंचक प्रारंभ 23.35
सूर्य उदय 07.16
सूर्य अस्त 18.22
चन्द्रमा मकर राशि में 23.35 तक
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18 जनवरी-2010
माघ शु.3
पंचक
सूर्य उदय 07.16
सूर्य अस्त 18.23
चन्द्रमा कुंभ राशि में
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19 जनवरी-2010
माघ शु.4
विनायक चतुर्थी, सकट चैथ
श्री गणेश जयंती
पंचक
सूर्य उदय 07.16
सूर्य अस्त 18.24
चन्द्रमा कुंभ राशि में
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20 जनवरी-2010
माघ शु.5
श्री पंचमी, वसंत पंचमी
पंचक
सूर्य उदय 07.16
सूर्य अस्त 18.24
चन्द्रमा कुंभ राशि में 12.09
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21 जनवरी-2010
माघ शु.6
देवनारायण जयंती
पंचक
सूर्य उदय 07.16
सूर्य अस्त 18.25
चन्द्रमा मीन राशि में
----------------------------
22 जनवरी-2010
माघ शु.7
सप्तमी
पंचक समाप्त 22.47
सूर्य उदय 07.16
सूर्य अस्त 18.26
चन्द्रमा मीन राशि में 22.47
-----------------------------
23 जनवरी-2010
माघ शु.8
नेताजी सुभाष जयंती
दुर्गाष्टमी
सूर्य उदय 07.16
सूर्य अस्त 18.26
चन्द्रमा मेष राशि में
----------------------------
24 जनवरी-2010
माघ शु.9
सूर्य उदय 07.16
सूर्य अस्त 18.27
चन्द्रमा मेष राशि में 30.05
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25 जनवरी-2010
माघ शु.10
सूर्य उदय 07.16
सूर्य अस्त 18.27
चन्द्रमा वृषभ राशि में
---------------------------
26 जनवरी-2010
माघ शु.11
जया एकादशी
गणतंत्र दिवस
सूर्य उदय 07.16
सूर्य अस्त 18.28
चन्द्रमा वृषभ राशि में
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27 जनवरी-2010
माघ शु.12
भीष्मद्वादशी
सूर्य उदय 07.16
सूर्य अस्त 18.29
चन्द्रमा वृषभ राशि में 09.37
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28 जनवरी-2010
माघ शु.13
लाला लाजपत राय जयंती
श्री विश्वकर्मा जयंती
प्रदोष
सूर्य उदय 07.15
सूर्य अस्त 18.29
चन्द्रमा मिथुन राशि में
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29 जनवरी-2010
माघ शु.14
पूर्णिमा प्रारंभ दोपहर 03.33
सूर्य उदय 07.15
सूर्य अस्त 18.30
चन्द्रमा मिथुन राशि में 10.11
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30 जनवरी-2010
माघ पूर्णिमा
महात्मा गांधी पुण्यतिथि
माघस्नान समाप्त गुरू रविदास जयंती
पूर्णिमा समाप्त सुबह 11.49
सूर्य उदय 07.15
सूर्य अस्त 18.30
चन्द्रमा कर्क राशि में
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31 जनवरी-2010
फाल्गुन कृ.1/2
गुरूप्रतिपदा
फाल्गुन मासारंभ
सूर्य उदय 07.15
सूर्य अस्त 18.31
चन्द्रमा कर्क राशि में 09.25 तक

मंगलवार, 17 नवंबर 2009

मन संकल्पात्मक होता है। मन का संकल्प कल्याणकारी हो सकता है और अकल्याणकारी भी

मन जो कहता है ,बस वो कहता है !
किसी बंधन में ये न बंधना चाहे ,किसी बचपन की हँसी हो जैसे ,
किसी रिश्ते का जो कुछ नाम हो,उसकी करता है इबादत जैसे !

मन संकल्पात्मकहोता है। मन कासंकल्पकल्याणकारी हो सकता है औरअकल्याणकारी भी। जब मन अधोगति की ओर बढ़ता हैतो जैसे जल-प्रवाह की अधोगति होती है उसी तरह संतापकारी संकल्पों को स्थान देने से हमारे अंदर गलत विचार उत्पन्न होते हैं और मन अधोगति की ओर बढ़ने लगता है। इसी संतापकारी भावनाओं से कुसंस्कारित जनों का साथ होने से हमारा मन इन्हीं कुत्सित विचारों और दुर्भावनाओं में भटकने लगता है। परिणामस्वरूप हम अध:पतन की ओर बढ़ने लगते हैं। हमारे मन के तराजू पर हर विचार और भावनाओं को तौलें जिससे विवेकपूर्वक तदर्थ श्रेष्ठ संस्कार, सद्विचार और सदाचरण हमें सही रास्ता दिखायेंगे। हमें अपने मन के केवल मनन करने से नहीं, अपितु अच्छे आचरण और श्रेष्ठ विचारों तथा सत्संग से कार्य का निष्पादन करना ही तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु है। गीता में कहा गया है कि मानव का मन वायु के प्रचंड वेग की तरह अत्यन्त बलवान होता है जिसे रोक पाना बहुत कठिन होता है। हमें चंचल मन के वेगों को रोकना चाहिए और मेरा मन कल्याणकारी संकल्पों वाला हो, ऐसी कामना से हम देश का, समाज का और मानव का कल्याण कर सकेंगे। साथ ही पुरुषार्थ चतुष्टय के धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति भी कर सकेंगे।

सोमवार, 26 अक्टूबर 2009

श्रीहरि-प्रबोधिनी एकादशी व्रत 29 अक्टूबर- 2009

धर्मराज युधिष्ठर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा- ‘हे वासुदेव ! कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का वर्णन कीजिए उसकी क्या महिमा है? इसका नाम प्रबोधिनी क्यों पड़ा? कृपया विस्तारपूर्वक बताने की कृपा करें।’ मै उस सवांद को आप सभी के सम्मुख इस आश्य से प्रस्तुत कर रहा हूं कि आप सभी इस अवसर पर अपने मन कि इच्छाओं को भगवान श्री हरि के समक्ष रखे और दान धर्म कर लाभ उठाये।
29 अक्टूबर- 2009 श्रीहरि-प्रबोधिनी एकादशी व्रत, देवोत्थान उत्सव, विष्णुत्रिरात्र पूर्ण, चातुर्मास व्रत-नियम पूर्ण, भीष्मपंचक प्रारंभ, तुलसी-विवाहोत्सव शुरू, संत नामदेव जयंती, सोनपुर मेला शुरू (बिहार), तीन वन-परिक्रमा (ब्रज), रवियोग सायं 4.49 बजे तक।

बोधिनी एकादशी का व्रत कार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी को किया जाता है। इस एकादशी को देवोत्थान एकादशी भी कहते हैं। एक समय धर्मराज युधिष्ठर ने गोपिका बल्लभ, विश्व के अधिष्ठान, सर्व प्राणियों में स्थित, परमश्रेष्ठ भगवान श्रीकृष्ण से पूछा- ‘हे वासुदेव ! कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का वर्णन कीजिए। उसकी क्या महिमा है? इसका नाम प्रबोधिनी क्यों पड़ा? कृपया विस्तारपूर्वक बताने की कृपा करें।’
भगवान श्रीकृष्ण बोले - ‘राजन्! कार्तिक के शुक्लपक्ष में जो एकादशी होती है, उसका जैसा वर्णन लोकस्रष्टा ब्रह्माजी ने नारदजी से किया था, वही मैं तुम्हें बतलाता हूं।’
नारदजी ने ब्रह्माजी से कहा- ‘पिताजी! जिसमें धर्म-कर्म में प्रवृत्ति कराने वाले भगवान गोविंद जागते हैं, उस ‘प्रबोधिनी’ एकादशी का माहात्म्य बतलाइए।’
ब्रह्माजी बोले- ‘मुनिश्रेष्ठ ! ‘प्रबोधिनी’ का माहात्म्य पाप का नाश, पुण्य की वृद्धि तथा उत्तम बुद्धिवाले पुरुषों को मोक्ष प्रदान करने वाला है। समुद्र से सरोवर तक जितने भी तीर्थ हैं, सभी अपने माहात्म्य की तभी तक गर्जना करते हैं, जब तक कि कार्तिक मास में भगवान विष्णु की ‘प्रबोधिनी’ तिथि नहीं आ जाती। प्रबोधिनी एकादशी का एक ही उपवास कर लेने से मनुष्य हजार अश्वमेध तथा सौ राजसूय यज्ञों का फल पा लेता है। पुत्र ! जो दुर्लभ है, जिसकी प्राप्ति असंभव है तथा जिसे त्रिलोक में किसी ने भी नहीं देखा है, वह वस्तु प्रबोधिनी एकादशी करने से प्राप्त हो जाती है। भक्तिपूर्वक उपवास करने पर मनुष्यों को यह एकादशी ऐश्वर्य, सम्पत्ति, उत्तम बुद्धि, राज्य तथा सुख प्रदान करती है। मेरु पर्वत के समान जो बड़े-बड़े पाप हैं, उन सबको यह पापनाशिनी प्रबोधिनी एक ही उपवास से भस्म कर देती है। हजारों पूर्व जन्मों में जो पाप किए गए हैं, उन्हें प्रबोधिनी की रात्रि का जागरण रुई की ढेरी के समान भस्म कर डालता है। जो लोग प्रबोधिनी एकादशी का मन से ध्यान करते तथा इसका अनुष्ठान करते हैं, उनके पितर नरक के दुखों से छुटकारा पाकर भगवान विष्णु के परमधाम को चले जाते हैं। ब्राह्मण ! अश्वमेध आदि यज्ञों से भी जिस फल की प्राप्ति कठिन है, वह प्रबोधिनी एकादशी को जागरण करने से अनायास ही मिल जाता है। संपूर्ण तीर्थों में नहाकर स्वर्ण और पृथ्वी दान करने से जो फल मिलता है, वह श्रीहरि के निमित्त जागरण करने मात्र से मनुष्य प्राप्त कर लेता है। जैसे मनुष्यों के लिए मृत्यु अनिवार्य है, उसी प्रकार धन-संपत्ति मात्र भी क्षणभंगुर हैं, ऐसा समझकर एकादशी का व्रत करना चाहिए। तीनों लोकों में जो भी तीर्थ संभव हैं, वे सब प्रबोधिनी एकादशी का व्रत करने वाले मनुष्य के घर में मौजूद रहते हैं। कार्तिक की ‘हरिबोधिनी’ एकादशी पुत्र तथा पौत्र प्रदान करने वाली है। जो मनुष्य प्रबोधिनी की उपासना करता है, वही ज्ञानी है, वही योगी है, वही तपस्वी और जितेंद्रिय है तथा उसी को भोग और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
पुत्र ! प्रबोधिनी एकादशी को भगवान विष्णु के निमित्त जो स्नान, दान, जप और होम किया जाता है, वह सब अक्षय होता है। जो लोग इस तिथि को उपवास करके भगवान माधव की भक्तिपूर्वक पूजा करते हैं, वे सौ जन्मों के पापों से छुटकारा पा जाते हैं। इस व्रत के द्वारा देवेश्वर जनार्दन को संतुष्ट करके मनुष्य संपूर्ण दिशाओं को अपने तेज से प्रकाशित करता हुआ श्रीहरि के बैकुण्ठ धाम को जाता है। ‘प्रबोधिनी’ को पूजित होने पर भगवान गोविन्द मनुष्यों के बचपन, जवानी और बुढ़ापे में किए हुए सौ जन्मों के पापों को, चाहे वे अधिक हों या कम, धो डालते हैं। अतः इस दिन सर्वथा प्रयत्न करके संपूर्ण मनोवांछित फलों को देने वाले देवाधिदेव जनार्दन की उपासना करनी चाहिए।
पुत्र नारद! जो भगवान विष्णु के भजन में तत्पर होकर कार्तिक में पराये अन्न का त्याग करता है, वह चान्द्रायण-व्रत का फल पाता है। जो प्रतिदिन शास्त्रीय चर्चा से मनोरंजन करते हुए कार्तिक मास व्यतीत करता है, वह अपने संपूर्ण पापों को जला डालता और दस हजार यज्ञों का फल प्राप्त करता है। कार्तिक मास में शास्त्रीय कथा के कहने-सुनने से भगवान मधुसूदन को जैसा संतोष होता है, वैसा उन्हें यज्ञ, दान, जप आदि से भी नहीं होता। जो शुभ कर्मपरायण पुरुष कार्तिक मास में एक या आधा श्लोक भी भगवान विष्णु की कथा बांचते हैं, उन्हें सौ गोदान का फल मिलता है। महामुने ! कार्तिक में भगवान केशव के सामने शास्त्र का स्वाध्याय तथा श्रवण करना चाहिए। मुनि श्रेष्ठ! जो कार्तिक में कल्याण-प्राप्ति के लोभ से श्रीहरि की कथा का प्रबंध करता है, वह अपनी सौ पढ़ियों को तार देता है। जो मनुष्य सदा नियमपूर्वक कार्तिक मास में भगवान विष्णु की कथा सुनता है, उसे सहस्र गोदान का फल मिलता है। जो प्रबोधिनी एकादशी के दिन श्रीविष्णु की कथा श्रवण करता है, उसे सातों द्वीपों से युक्त पृथ्वी दान करने का फल प्राप्त होता है। मुनि श्रेष्ठ ! जो लोग भगवान विष्णु की कथा सुनकर अपनी शक्ति के अनुसार कथा-वाचक की पूजा करते हैं, उन्हें अक्षय लोक की प्राप्ति होती है। नारद! जो मनुष्य कार्तिक मास में भगवत्संबंधी गीत और शास्त्र-विनोद के द्वारा समय बिताता है, उसकी पुनरावृत्ति मैंने नहीं देखी है। मुने! जो पुण्यात्मा पुरुष भगवान के समक्ष गान, नृत्य, वाद्य और श्रीविष्णु की कथा करता है, वह तीनों लोकों के ऊपर विराजमान होता है।
मुनिश्रेष्ठ! कार्तिक की प्रबोधिनी एकादशी के दिन बहुत-से फल-फूल, कपूर, अरगजा और कुंकुम के द्वारा श्रीहरि की पूजा करनी चाहिए। एकादशी आने पर धन की कंजूसी नहीं करनी चाहिए; क्योंकि उस दिन दान आदि करने से असंख्य पुण्य की प्राप्ति होती है। प्रबोधिनी को जागरण के समय शंख में जल लेकर फल तथा नाना प्रकार के द्रव्यों के साथ श्रीजनार्दन को अघ्र्य देना चाहिए। संपूर्ण तीर्थों में स्नान करने और सब प्रकार के दान देने से जो फल मिलता है, वही प्रबोधिनी एकादशी को अघ्र्य देने से करोड़ गुना होकर प्राप्त होता है। देवर्षि ! अघ्र्य के पश्चात् भोज-आच्छादन और दक्षिणा आदि के द्वारा भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए गुरु की पूजा करनी चाहिए। जो मनुष्य उस दिन श्रीमद्भागवत की कथा सुनता अथवा पुराण का पाठ करता है, उसे एक-एक अक्षर पर कपिलादान का फल मिलता है। मुनिश्रेष्ठ ! कार्तिक में जो मनुष्य अपनी शक्ति के अनुसार शास्त्रोक्त रीति से वैष्णवव्रत (एकादशी) का पालन करता है, उसकी मुक्ति अविचल है। केतकी के एक पत्ते से पूजित होने पर भगवान गरुड़ध्वज एक हजार वर्ष तक अत्यंत तृप्त रहते हैं। देवर्षे ! जो अगस्त के फूल से भगवान जनार्दन की पूजा करता है, उसके दर्शन मात्र से नरक की आग बुझ जाती है। वत्स ! जो लोग कार्तिक में भगवान जनार्दन को तुलसी के पत्र और पुष्प अर्पित करते हैं, उनका जन्म भर का किया हुआ सारा पाप भस्म हो जाता है। मुने! जो प्रतिदिन दर्शन, स्पर्श, ध्यान, नाम-कीर्तन, स्तवन, अर्पण, सेचन, नित्यपूजन तथा नमस्कार के द्वारा तुलसी में नव प्रकार की भक्ति करते हैं, वे कोटि सहस्र युगों तक पुण्य का विस्तार करते हैं।
तुलसीदलपुष्पाणि ये यच्छन्ति जनार्दने। कार्तिके सकलं वत्स पापं जन्मार्जितं दहेत्।।
दृष्टा स्पृष्टाथ वा ध्याता कीर्तिता नामतः स्तुता। रोपिता सेचिता नित्यं पूजिता तुलसी नता।।
नवधा तुलसीभक्तिं ये कुर्वन्ति दिने दिने। युगकोटिसहस्राणि तन्वन्ति सुकृतं मुने।।
नारद ! सब प्रकार के फूलों और पत्तों को चढ़ाने से जो फल होता है, वह कार्तिकमास में तुलसी का एक पत्ता चढ़ाने से मिल जाता है। कार्तिक मास में प्रतिदिन नियमपूर्वक तुलसी के कोमल पत्तों से महाविष्णु श्रीजनार्दन का पूजन करना चाहिए। सौ यज्ञों द्वारा देवताओं का यजन करने और अनेक प्रकार के दान देने से जो पुण्य होता है, वह कार्तिक में तुलसीदल मात्र से केशव की पूजा करने पर प्राप्त हो जाता है।
मुनिश्रेष्ठ !
यद्यपि भगवान क्षण भर भी सोते नहीं हैं, फिर भी भक्तों की भावना ‘यथादेहे तथा देवे’ के अनुसार चार मास शयन करते हैं। भगवान विष्णु के क्षीर शयन के विषय में प्रसिद्ध है कि उन्होंने एकादशी के दिन ही महापराक्रमी शंखासुर नामक राक्षस को मारा था और उसके बाद थकावट दूर करने के लिए क्षीर सागर में जाकर सो गए। वे वहां चार माह तक शयन करते रहे और कार्तिक शुक्ल एकादशी को जगे। इसी से इसका नाम देवोत्थान या प्रबोधिनी एकादशी पड़ा । इस दिन व्रत के रूप में उपवास करने का विशेष महत्व है। यदि उपवास संभव न हो तो एक समय फलाहार करना चाहिए और संयम नियमपूर्वक रहना चाहिए। इस तिथि को रात्रि जागरण का विशेष महत्व है। रात्रि में भगवत्संबंधी कीर्तन, जप, वाद्य, नृत्य और पुराणों का पाठ करना चाहिए। धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प, गंध, चंदन, फल, अघ्र्य आदि से गोविन्द भगवान की पूजा करके घंटा, शंख, मृदंग आदि वाद्यों की कर्णप्रिय, मनोहारी मांगलिक ध्वनि तथा निम्न मंत्रों द्वारा भगवान से जागने की प्रार्थना करें।
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पते।
त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत सुप्तं भवेदिदम्।।
उतिष्ठोत्तिष्ठ वाराह दंष्ट्रोद्धृतवसुन्धरे।
हिरण्याक्षप्राणघातिन् त्रैलोक्ये मंगलं कुरू।।
इसके बाद भगवान की आरती करें और पुष्पांजलि अर्पित करके निम्न मंत्रों से प्रार्थना करें-
इयं तु द्वादशी देव प्रबोधाय विनिर्मिता।
त्वयैव सर्वलोकानां हितार्थं शेषशायिना।।
इदं व्रतं मया देव कृतं प्रीत्यै तव प्रभो।
न्यूनं सम्पूर्णतां यातु त्वत्प्रसादाज्जनार्दन।।तदनंतर भक्त प्रह्लाद, नारद, परशुराम, पुण्डरीक, व्यास, अम्बरीश, शुक्र, शौनक और भीष्मादि भक्तों का स्मरण करके चरणामृत और प्रसाद भक्तों को वितरण कर ग्रहण करना चाहिए। द्वादशी के दिन पुनः भगवान गोविन्द का पूजन कर ब्राह्मणों को भोजनादि पदार्थों से तृप्त कर दान दक्षिणा सहित विदाकर स्वयं प्रसाद ग्रहण करना चाहिए।

शनिवार, 10 अक्टूबर 2009

अमावस्या में दीपावली मनाया जाना उचित है

17 अक्टूबर को उदयतिथि चतुर्दशी दोपहर 12:38 बजे तक है। इसके बाद अमावस्या शुरू होगी, जो अगले दिन सुबह 11:04 बजे तक रहेगी। शास्त्रों के अनुसार प्रदोषकाल से रात्रि तक रहने वाली अमावस्या में दीपावली मनाया जाना उचित है। इस कारण 17 अक्टूबर को चतुर्दशी के दिन ही दीपावली मनाई जाएगी।’पांच दिवसीय दीपोत्सव 15 अक्टूबर को 4:40 बजे तक ही द्वादश तिथि रहेगी। इसके बाद त्रयोदशी होने से धनतेरस भी मनेगी। 16 अक्टूबर को त्रयोदशी दोपहर 2:32 बजे तक रहेगी। इसके बाद चतुर्दशी का दीपदान होगा। 17 अक्टूबर को चतुर्दशी दोपहर 12:38 बजे तक रहेगी। इसके बाद अमावस्या शुरू होगी। इस लिए इसी दिन रात को लक्ष्मीपूजन के साथ दीपावली मनाई जाएगी। 18 अक्टूबर को अमावस्या सुबह 11:04 तक रहेगी। फिर प्रतिपदा शुरू होगी। इसी दिन गोवर्धन पूजा होगी। 19 अक्टूबर को प्रतिपदा सुबह 9:58 बजे तक रहेगी। इसके बाद भाईदूज का पर्व मनाया जा सकेगा।
प्रदोश काल ---सायं काल 05-47 से 08-20 तक रात्रि में वृषलग्न--07-21 से 09-15 तक मध्य रात्रि मे सिंह लग्न --02-00 से 04-16 तक चौघडियां मुहूर्त --शाम 05 से 07--28 तक शुभ अमृत तथा चर के चौघडियां रात्रि 09 से मध्य रात्रि 01--47बजे तक

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2009

शत्रुता समाप्ति के लिए टोटके



शत्रुता समाप्ति के लिए टोटके


हमे प्राप्त मेलो के जन्म लग्ग्ल चक्र के आधार पर ज्योतिष पुस्तको एवं विद्धवानो के अनुभव के आधार पर जनकल्याण के उद्धेश्य से देना प्रारम्भ कर रहें हैं।
अपने पूजा स्थल में शुक्ल पक्ष के बृहस्पतिवार को बगलामुखी यंत्र स्थापित करें। नित्य नहा धोकर यंत्र के दर्शन करें। गेंदे का एक पीला फूल अवश्य चढ़ाएं। शत्रु शत्रुता त्याग दें यह प्रार्थना दीन भाव से करें, कुछ ही समय में प्रबल शत्रु तक की शत्रुता समाप्त हो जाएगी।
यह विद्या शत्रु का नाश करने में अद्भुत है, वहीं कोर्ट, कचहरी में, वाद-विवाद में भी विजय दिलाने में सक्षम है। इसकी साधना करने वाला साधक सर्वशक्ति सम्पन्न हो जाता है।
इस साधना में विशेष सावधानियाँ रखने की आवश्यकता होती है जिसे हम यहाँ पर देना उचित समझते हैं। इस साधना को करने वाला साधक पूर्ण रूप से शुद्ध होकर (तन, मन, वचन) एक निश्चित समय पर पीले वस्त्र पहनकर व पीला आसन बिछाकर, पीले पुष्पों का प्रयोग कर, पीली (हल्दी) की 108 दानों की माला द्वारा मंत्रों का सही उच्चारण करते हुए कम से कम 11 माला का नित्य जाप 21 दिनों तक या कार्यसिद्ध होने तक करे या फिर नित्य 108 बार मंत्र जाप करने से भी आपको अभीष्ट सिद्ध की प्राप्ति होगी।
आँखों में तेज बढ़ेगा, आपकी ओर कोई निगाह नहीं मिला पाएगा एवं आपके सभी उचित कार्य सहज होते जाएँगे। खाने में पीला खाना व सोने के बिछौने को भी पीला रखना साधना काल में आवश्यक होता है वहीं नियम-संयम रखकर ब्रह्मचारीय होना भी आवश्यक है।
मां बगलामुखी साधना का उद्देश्य व लाभ
शत्रु शमन, मुकदमों, किसी तरह की प्रतिस्पर्धा आदि में विजय मन चाहे व्यक्ति से भेंटअनिष्ट ग्रहों के दुष्प्रभावों का शमनकार्यक्षेत्र में सफलता वाक् सिद्धिफंसे हुए धन की प्राप्तिरोंगो से मुक्ति शरीर में ‘वात’ का संतुलन बनाए रखनाबुरी आत्माओं से बचाव व प्रेत बाधा आदि से मुक्तिदुर्घटना, घाव, आपरेशन आदि से रक्षा14 बार इंद्र या वरुण मंत्र से अभिमंत्रित यंत्र को बाढ़ के जल में फेंक देने से बाढ़ रुक जाती हैपूजन विधि: सर्वप्रथम पीत वस्त्र बिछा कर उसपर पीले चावल की ढेरी बनावें। सामने पीतांबरा का चित्र रख कर, या चावल की ढेरी को पीतांबरा देवी मान कर उसकी विधिवत पंचमोपचार से पूजा करें। पीले पुष्प, पीले चावल आदि का उपयोग करें। घी, या तेल का दीपक जला कर सर्वप्रथम गुरु पूजा, फिर पीतांबरा देवी की पूजा करें। इसके पश्चात् संकल्प करें कि मैं अपनी अमुक समस्या के समाधान हेतु (समस्याः पारिवारिक कष्ट, पति, या पत्नी के अत्याचार से दुःखी हों आदि) पीतांबरा मंत्र माला 108 बार जप कर रहा हूं। मुझे इससे मुक्ति दिलावें।
ऊँ ह्मीं बगलामुखी सर्व दुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलम बुद्धिं विनाशय ह्मीं ऊँ स्वाहा।

सोमवार, 5 अक्टूबर 2009

आय में वृर्दि के लिये प्रयोग

हमारे शास्त्रो में लक्ष्मी को प्रसन्न करने के अनेक उपायो का उल्लेख मिलता हैं और हमारे पूर्वजो ने इनका प्रयोग करके लाभ उठाया हैं यह प्रयोग मैं अपने शिष्यों को पिछलें २० वर्षो से करा रहा हूं लाभ हुआ इच्छा हुई कि आप सभी तक यह प्रयोग पहुचें। जब आप अपने कार्यालय या व्यापार स्थल पर जा कर बैठते हैं उस समय सर्व प्रथम देहली को प्रणम करे और बैठने के स्थान पर बैठ कर ईश्वर का ध्यान करते हुऐ यह चौपाई पढे।
जे सकाम नर सुनहिं जे गावहिं।
सुख संपति नाना विध पावहिं।।
मुझे विश्वास हैं कि भगवान आपकी मनोकामना को अवश्य पूर्ण करेगे।